पंकज दाऊद @ बीजापुर। सीआरपीएफ की 85 बटालियन के मुख्यालय परिवर्तन कैम्प के आरक्षक प्रदीप पात्रा ने रविवार को जिला हाॅस्पिटल में भर्ती पोंजेर गांव की युवती शारदा माण्डवी (22) पति रवि माण्डवी को रक्तदान किया। शारदा ने 22 अप्रैल को एक बच्चे को जन्म दिया था। उसे खून की जरूरत थी। इसकी जानकारी मिलने पर कमाण्डेंट सुधीर कुमार ने खून का इंतजाम करवाया।
अब एक सवाल ये भी उठने लगा है कि जब धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र के किसी मरीज को मदद की जरूरत होती है, तब समाज कल्याण और गरीब-आदिवासियों के लिए तथाकथित संघर्ष की बात करने वाले माओवादी कहां चले जाते हैं।
बता दें कि पोंजेर अतिसंवेदनषील गांव है। पोंजेर ही नहीं बल्कि मनकेली, चिन्नाकोड़ेपाल समेत कई नक्सल प्रभावित गांवों के लोगों को जवानों ने रक्तदान किया है। डेढ़ साल में ढाई दर्जन से भी अधिक लोगों को इसका फायदा मिला है। सुरक्षा बल के जवानों के खून से अब तक कई जिंदगियां बच चुकी है।
जिला हाॅस्पिटल में आने वाले जरूरतमंद लोगों ने अब ये सवाल उठाना शुरू किया है कि माओवादी हमेशा गरीब आदिवासियों के लिए कथित संघर्ष की बात करते हैं और उनके लिए शिक्षा व स्वास्थ्य सेवा की मांग करते हैं। लेकिन जब कभी इन दोनों सुविधाओं की जरूरत पड़ती है, तो प्रशासन के अलावा सीआरपीएफ भी ये सुविधा इन गरीब आदिवासियों को मुहैया कराती है। तब नक्सली गायब हो जाते हैं।
कमांडेंट सुधीर कुमार का कहना है कि इन सारी सुविधाओं के बाद भी यदि गांव के लोग फोर्स की मदद नहीं करेंगे और नक्सलियों का साथ देंगे, तो मानवता खत्म हो जाएगी। उन्होंने नक्सल प्रभावित गांवों के लोगों से माओवादियों का साथ ना देने और सुविधाओं के लिए फोर्स का साथ देने की अपील की है। उन्होंने कहा कि नक्सली हिंसा करते हैं और इससे गरीब आदिवासियों का भला नहीं हो सकता।




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